हेमंत खंडेलवाल को मध्य प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष बनाकर मारा है मास्टर स्ट्रोक ?
मध्य प्रदेश BJP को बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल के रूप में नया प्रदेश अध्यक्ष मिल गया है। लंबे इंतजार के बाद पार्टी अपना अध्यक्ष तय कर पाई जिसके बाद इस बात की तहकीकात की जा रही है कि आखिर उन्हें ही क्यों अध्यक्ष बनाया गया।
दरअसल हेमंत खंडेलवाल को लेकर कहा जा रहा है वो आरएसएस के नजिक है। मुख्यमंत्री मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, विष्णु दत्त शर्मा और अन्य नेताओं ने उनके नाम समर्थन दिया था। साथ हीं साथ उनकी नियुक्ति मध्य प्रदेश की राजनीति में क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
चलिए जानते हैं कौन हैं हेमंत खंडेलवाल और क्या है उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने का कारण
सबसे पहले बताते है हेमंत खंडेलवाल है कौन। वर्तमान में बैतूल से विधायक है उनके पिता स्वर्गीय विजय कुमार खंडेलवाल बैतूल से चार बार सांसद रहे और बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। 2007 में उनके निधन के बाद हेमंत ने बैतूल-हरदा लोकसभा उपचुनाव जीता और सांसद बने। बीजेपी बैतूल के जिला अध्यक्ष रहे, 2013-2018 तक बैतूल से विधायक रहे, और 2014-2018 तक प्रदेश बीजेपी के कोषाध्यक्ष रहे। फिर 2023 में दोबारा विधायक
आइये अब वो वजह भी देख लेते है जिनके तहत उनके नाम पर मोहर लगी।
पहली वजह हेमंत खंडेलवाल लो-प्रोफाइल, सादगी और संगठन में गहरी पकड़ रखने वाले नेता हैं। उनकी निर्विवाद छवि और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से निकटता उनकी नियुक्ति का प्रमुख कारण रही।
दूसरा कारण हेमंत खंडेलवाल की नियुक्ति के जरिए बीजेपी ने क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन को साधने की रणनीति अपनाई है। मध्य प्रदेश में जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों का महत्वपूर्ण प्रभाव है, और बीजेपी ने इसे ध्यान में रखकर उन्हें चुना है। हेमंत खंडेलवाल वैश्य समुदाय से आते हैं, यह वैश्य वोट बैंक को साधने का प्रयास है। प्रदेश में ओबीसी की आबादी 50% से अधिक है। यह नियुक्ति सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने और 2028 के विधानसभा चुनावों में सभी वर्गों का समर्थन हासिल करने का मास्टर स्ट्रोक मानी जा रही है।
तीसरी और सबसे बड़ी वजह विधायक के रूप में हेमंत की नियुक्ति से मुख्यमंत्री मोहन यादव के साथ उनका बेहतर समन्वय होगा, वह मोहन यादव और शिवराज सिंह दोनों के करीबी माने जाते है। और दोनों की उनके नाम पर सहमति के बाद ही घोषणा की गयी।
चौथा कारण उनका परदे के पीछे से काम करने की शैली भी है। 2020 में तख्तापलट और कांग्रेस सरकार गिराने में खंडेलवाल ने चुनाव प्रभारी के रूप में अहम भूमिका निभाई। इस दौरान उनके सिंधिया से भी अच्छे रिश्ते बन गए थे जिसका फायदा उन्हें अभी मिला है।वही इसके अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव में छिंदवाड़ा में कमलनाथ की हार के हेमंत खंडेलवाल सूत्रधार माने गए।
आज हेमंत खंडेलवाल की नियुक्ति बीजेपी की रणनीति का हिस्सा है, जो जातीय और क्षेत्रीय संतुलन के साथ-साथ संगठनात्मक मजबूती पर केंद्रित है। उनकी लो-प्रोफाइल छवि, आरएसएस से निकटता, और संगठन में अनुभव उन्हें इस भूमिका के लिए उपयुक्त बनाते हैं। हालांकि, नरोत्तम मिश्रा जैसे दिग्गजों को न चुने जाने से कुछ असंतोष हो सकता है, लेकिन बीजेपी की एकजुटता और हाईकमान की रणनीति इसे नियंत्रित कर सकती है। हेमंत की अग्निपरीक्षा अब 2028 के विधानसभा चुनावों में होगी, जहां उनकी संगठनात्मक क्षमता और नेतृत्व की असली परीक्षा होगी।