सागर- 46 साल से मिट्टी में आस्था गढ़ रहे कोमल मूर्तिकार, बेटों ने संभाली विरासत
मिट्टी को आकार देकर जब उसमें आस्था के रंग भरे जाते हैं, तो एक साधारण मिट्टी देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमा का रूप ले लेती है। सागर जिले के गढ़ाकोटा के शिवाजी वार्ड निवासी कोमल कोरी मूर्तिकार पिछले करीब 46 वर्षों से इसी कला को साध रहे हैं। मां दुर्गा और भगवान गणेश की प्रतिमाओं को अपने हाथों से आकार देने वाले कोमल मूर्तिकार की कला अब पूरे क्षेत्र में पहचान बना चुकी है। खास बात ये है कि उनके दोनों बेटे भी पिता की इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। ये तस्वीरें गढ़ाकोटा के उस कलाकार की हैं, जिसके हाथों में मिट्टी आते ही उसमें आस्था का स्वरूप दिखाई देने लगता है। कोमल कोरी पिछले 46 वर्षों से मिट्टी से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं।
मिट्टी तैयार करने से लेकर उसे आकार देना, प्रतिमा को सुखाना, रंग-रोगन करना और फिर अंतिम श्रृंगार तक हर काम बेहद बारीकी से किया जाता है। प्रतिमा तैयार करने के हर चरण में उनकी मेहनत और वर्षों का अनुभव साफ दिखाई देता है। कोमल मूर्तिकार की इस कला को अब उनके दोनों बेटे भी आगे बढ़ा रहे हैं। मनीष कोरी सहित दोनों बेटे पिता के साथ प्रतिमा निर्माण में हाथ बंटाते हैं और इस पारंपरिक हुनर को सीख रहे हैं।
परिवार से जुड़ी यह कला आने वाली पीढ़ी तक पहुंचे, इसके लिए पूरा परिवार लगातार प्रयास कर रहा है। गणेश उत्सव और नवरात्रि के दौरान प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम तेजी से चलता है। कोमल कोरी के लिए प्रतिमा बनाना सिर्फ रोजगार का जरिया नहीं, बल्कि आस्था और ईश्वर की सेवा का माध्यम है। उनका कहना है कि मिट्टी को भगवान की प्रतिमा का रूप देना उनके लिए साधना जैसा है।
वर्ष 2020 से उन्हें पंडित गोपाल भार्गव की ओर से मिट्टी के गणेश की प्रतिमाएं तैयार करने का काम भी दिया जा रहा है। तैयार प्रतिमाओं का श्रद्धालुओं के बीच निशुल्क वितरण किया जाता है। इस पहल के जरिए मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने का प्रयास किया जाता है। आज जब आधुनिक तकनीक और मशीनों का प्रभाव पारंपरिक मूर्तिकला पर भी दिखाई दे रहा है, ऐसे समय में कोमल मूर्तिकार जैसे कलाकार इस कला की विरासत को अपने हाथों से जिंदा रखे हुए हैं।
46 वर्षों में हजारों प्रतिमाओं को आकार दे चुके कोमल अब अपनी कला को बेटों के जरिए आगे बढ़ते देख रहे हैं। मिट्टी से आकार लेती हर प्रतिमा उनके हुनर के साथ-साथ आस्था और परंपरा की कहानी भी कहती है। गढ़ाकोटा के कोमल मूर्तिकार की कहानी बताती है कि कला सिर्फ हाथों का हुनर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही साधना भी होती है। 46 वर्षों की मेहनत के बाद आज उनकी कला को नई पहचान मिल रही है और उनके बेटे इस विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।