Sagar - साहब ! इतनी ऊर्जा नकली शराब रोकने में लगाई होती तो आज 32 परिवार नहीं उजड़ते
सागर में जहरीली शराब ने जो त्रासदी मचाई है, उसे शायद दशकों तक भुलाया नहीं जा सकेगा। कई घरों के चिराग बुझ गए, कई परिवारों से उनका पिता, बेटा, भाई या पति हमेशा के लिए छिन गया। इस त्रासदी ने सिर्फ अवैध शराब के कारोबार को उजागर नहीं किया, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसकी जिम्मेदारी ऐसे अवैध कारोबार पर रोक लगाने की है।
सबसे बड़ा सवाल पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर है। गांव की गलियों से लेकर कस्बों तक अवैध शराब की बिक्री की चर्चा आम है। आखिर यह कारोबार पुलिस की नजर से कैसे बचता रहा? अगर अवैध शराब के खिलाफ उसी स्तर की मुस्तैदी दिखाई गई होती, जिस स्तर की मुस्तैदी मुख्यमंत्री के सागर आने से पहले बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में नजर आई, तो शायद आज कई परिवार अपने अपनों के साथ होते।
मुख्यमंत्री के दौरे से पहले मेडिकल कॉलेज परिसर में पुलिस का पहरा ऐसा था, मानो अस्पताल कोई संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्र नहीं बल्कि जनता के लिए प्रतिबंधित इलाका हो। गेट बंद, सीढ़ियों पर पुलिसकर्मी, लिफ्ट तक निगरानी में और मरीजों से मिलने आए परिजन बाहर रोक दिए गए। विडंबना देखिए—अंदर वार्ड में भर्ती मरीज अपने परिजनों का इंतजार करते रहे और बाहर उनके परिजन पुलिस की अनुमति का। कोई पानी की बोतल लेकर आया था, कोई जूस लेने, कोई दवा लेने तो कोई मरीज की जरूरत का सामान लेकर। लेकिन मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर उन्हें अस्पताल के अंदर तक जाने में परेशानी उठानी पड़ी।
सुरक्षा जरूरी है, लेकिन क्या सुरक्षा का मतलब यह है कि एक बीमार मरीज का परिजन भी अस्पताल में प्रवेश न कर सके? क्या अस्पताल में भर्ती मरीजों की जरूरतें मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान कुछ घंटों के लिए महत्वहीन हो जाती हैं? और यहीं से सवाल और तीखा हो जाता है। जिस पुलिस की ऊर्जा मरीजों के परिजनों को रोकने, रास्ते बंद करने और अस्पताल में पहरा लगाने में लगी थी, अगर उसी ऊर्जा का एक हिस्सा अवैध शराब के नेटवर्क को रोकने में लगाया जाता तो शायद तस्वीर कुछ और होती।
लेकिन अवैध शराब रोकने में तो हरे नीले कागज आड़े आ जाते हैं, ईमानदारी तो केवल आम जनता पर जोर दिखने में नजर आती है