सागर- जन्म के पहले घंटे में स्तनपान, शिशु के स्वस्थ जीवन की मजबूत शुरुआत: IMA सागर ने माताओं को किया जागरूक
सनोधा के आयुष्मान आरोग्य मंदिर में जागरूकता कार्यक्रम; छह माह तक केवल मां का दूध देने और कोलोस्ट्रम के महत्व की दी जानकारी
सागर। नवजात शिशुओं के बेहतर स्वास्थ्य और माताओं को स्तनपान के वैज्ञानिक महत्व की जानकारी देने के उद्देश्य से इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA), सागर द्वारा आयुष्मान आरोग्य मंदिर सनोधा में स्तनपान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में गर्भवती महिलाओं, नवमाताओं और उनके परिवारों को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करने तथा छह माह तक केवल मां का दूध देने के महत्व के बारे में जानकारी दी गई।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए IMA सागर के अध्यक्ष डॉ. तल्हा साद ने कहा कि जन्म के बाद का शुरुआती समय शिशु के स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू करना और पहले छह माह तक केवल मां का दूध देना शिशु के लिए बेहतर शुरुआत मानी जाती है। मां का दूध शिशु को आवश्यक पोषण देने के साथ संक्रमणों से बचाव में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कोलोस्ट्रम को न समझें सामान्य दूध
डॉ. साद ने बताया कि जन्म के बाद शुरुआती दिनों में निकलने वाला गाढ़ा पीला दूध कोलोस्ट्रम कहलाता है। कई बार परिवार के लोग इसे सामान्य दूध से अलग समझकर नवजात को देने से रोक देते हैं, जबकि यह शिशु के लिए महत्वपूर्ण होता है।
उन्होंने परिवार के सदस्यों से अपील की कि वे मां को भावनात्मक और व्यावहारिक सहयोग दें, ताकि वह बच्चे को समय पर और सही तरीके से स्तनपान करा सके।
छह माह तक पानी, शहद और घुट्टी की जरूरत नहीं
कार्यक्रम में माताओं को बताया गया कि सामान्य परिस्थितियों में जन्म से छह माह तक शिशु को केवल मां का दूध दिया जाना चाहिए। इस अवधि में पानी, शहद, घुट्टी, चाय या अन्य तरल पदार्थ देने की आवश्यकता नहीं होती। छह माह पूरे होने के बाद स्तनपान जारी रखते हुए बच्चे की उम्र के अनुसार पौष्टिक पूरक आहार शुरू किया जाना चाहिए।
डॉ. साद ने कहा कि शिशु को उसकी मांग के अनुसार स्तनपान कराया जाना चाहिए। बच्चे के भूख के संकेतों को समझना और सही तरीके से स्तनपान कराना मां और बच्चे दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
मां के स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद
कार्यक्रम में बताया गया कि स्तनपान केवल शिशु के लिए ही नहीं, बल्कि मां के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। इससे प्रसव के बाद गर्भाशय को सामान्य स्थिति में लौटने में मदद मिलती है और मां एवं बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है।
डॉ. साद ने माताओं को पर्याप्त पौष्टिक भोजन, पर्याप्त पानी, आराम और परिवार के सहयोग के महत्व की भी जानकारी दी।
कामकाजी माताओं को भी दिया संदेश
कामकाजी माताओं की समस्याओं पर चर्चा करते हुए डॉ. साद ने कहा कि नौकरी या अन्य व्यस्तताओं के बावजूद स्तनपान जारी रखने की योजना बनाई जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर मां का निकाला हुआ दूध स्वच्छ तरीके से सुरक्षित रखकर शिशु को दिया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि यदि बच्चे के दूध न पीने, स्तन में तेज दर्द या स्तनपान से जुड़ी किसी अन्य समस्या का सामना करना पड़े तो स्वास्थ्यकर्मी या चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।
भ्रांतियों को दूर करने में परिवार की भूमिका अहम
डॉ. साद ने कहा कि समाज में स्तनपान को लेकर कई पारंपरिक धारणाएं और भ्रांतियां आज भी मौजूद हैं। इन्हें दूर करने में परिवार की सकारात्मक भूमिका महत्वपूर्ण है। खासतौर पर पति और परिवार के बुजुर्गों का सहयोग मां को स्तनपान जारी रखने में मदद कर सकता है।
कार्यक्रम के सफल आयोजन में पिरामल स्वास्थ्य की आयुषी शुक्ला का महत्वपूर्ण योगदान रहा। स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों और नागरिकों ने भी कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता की।