सागर- 9 पीढ़ियों पुरानी गणेश विसर्जन परंपरा, डोल ग्यारस पर नम आंखों से दी बप्पा को विदाई
सागर शहर में गणेशोत्सव के दौरान सागर में एक ऐसी अनूठी परंपरा निभाई गई, जो आज भी करीब आठ पीढ़ियों से पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ आगे बढ़ रही है। मराठा काल से चली आ रही इस परंपरा के तहत डोल ग्यारस के पावन अवसर पर लक्ष्मीपुरा वार्ड स्थित गुरु फर्श पर विराजे भगवान गणेश का विधि-विधान से विसर्जन किया गया। मंगलवार को डोल ग्यारस के मौके पर प्रथम पूज्य भगवान गणेश को पहले तालाब में नौका विहार कराया गया। इसके बाद गाजे-बाजे और धार्मिक जयकारों के बीच भगवान गणेश की विसर्जन शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में बड़ी संख्या में आसपास के वार्डों के रहवासी शामिल हुए।
पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लेजम की थाप के बीच निकली शोभायात्रा में भक्तों का उत्साह देखते ही बन रहा था। जगह-जगह श्रद्धालुओं ने भगवान गणेश के दर्शन किए और गुलाल उड़ाते हुए गणपति बप्पा मोरया के जयकारे लगाए। इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा को छाना नदी में विधि-विधान के साथ विसर्जित किया गया। पं. जगदीश गुरु के मुताबिक, यह उनके परिवार की आठ पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा है, जिसकी शुरुआत मराठा काल से मानी जाती है। खास बात यह है कि यहां स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा की पूजा केवल गणेशोत्सव तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे वर्ष श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की जाती है।
परंपरा के अनुसार, हर वर्ष गणेश चतुर्थी पर नई प्रतिमा स्थापित की जाती है। वहीं, वर्षभर पूजित पुरानी प्रतिमा का डोल ग्यारस के दिन विसर्जन किया जाता है। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है। विसर्जन के दौरान पूरा क्षेत्र भक्तिमय नजर आया। श्रद्धालुओं ने नम आंखों से बप्पा को विदाई दी और अगले वर्ष फिर आने की कामना की। आयोजन में निशांत गुरु, शैलेंद्र गुरु, मनोज गुरु, गणेश गुरु सहित बड़ी संख्या में वार्डवासी मौजूद रहे।