त्याग ईश्वर का दूसरा रूप, संग्रह में वह आनंद नहीं जो त्याग में है बोले संतश्री नागर जी

खुरई। त्याग ईश्वर का दूसरा रूप है। यदि त्याग वृत्ति आ जाए तो त्याग में शांति है, संग्रह में उतना आनंद नहीं जितना त्याग में है। मिल गया तो दूध बराबर, मांग लिया तो पानी, चूस लिया तो खून बराबर, यह संतों की वाणी। जीवन के अंत में देह के वस्त्र, कमर का कडोरा, हाथ पांव का तागा सब निकाल दिया जाता है, बस आत्मा और परमात्मा ही शेष रह जाता है।’ पूज्य संत श्री कमल किशोर नागर जी ने खुरई में प्रवाहित हो रही श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस त्याग और पुण्य की महिमा पर अपने अमृत वचनों में यह आशीर्वचन कहे।
व्यास गादी पर विराजमान संत श्री नागर जी ने आज मेले में खिलौना खरीद कर उसे खिलौने को बरतने की अमीर और गरीब के बच्चों की प्रवृत्ति से जीव आत्मा और देह की समानता करते हुए कहा कि रईस का बच्चा खिलौने को कुछ ही देर में खेलकर तोड़ फोड़ देता है लेकिन गरीब पिता का अभावों में पला बच्चा अपने पिता की शिक्षा पर चलता हुआ खिलौने से संभाल कर खेलता है और मन भर जाने पर ज्यों का त्यों पिता को वापस लौटा देता है ताकि पिता उसी मेले में खिलौने को बेच कर अपने परिवार को संध्या के भोजन की व्यवस्था कर सके। श्री नागर जी ने कहा कि हमारा जीवन और देह भी एक खिलौने की तरह है, इससे खूब खेल लो और जीवन के चौथे पहर अगले जन्म की तैयारी के लिए जस का तस वापस कर दो। जैसे कबीर ने किया। ध्रुव प्रह्लाद सुदामा ने ओढ़ी, दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया। एक दाग नहीं लगने दिया जीवन की चदरिया में। खराब नहीं होने दी और वापस लौटा दी। स्मरण रखिए कि संसार से जो हमने लिया उसे लौटाना भी है, फिर जो मिलेगा वह मुक्ति ही मिलेगी। इस कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि जीवन में धंधा, रोजगार, नौकरी सब खेल खेलो और जीवन के चौथे आश्रम के लिए निवृत हो जाओ, मुक्ति की व्यवस्था करो। जा का वा को दीजिए जिसका जो कुछ होए। आखिरी में हाय हाय समाप्त हो हरि-हरि शेष रह जाए।
संत श्री नागर जी ने जैन दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां अहिंसा की बात होती है। असंचय और आस्तेय की चर्चा होती है। पहनने, खाने, रहने और रहनी में आत्मा को भी चोट न लग जाए, देखने में भी हिंसा हो सकती है ऐसा संयम भाव। हमारे चमक धमक भरे आचरण से ,पहनने ओढ़ने से भी किसी को आघात लग जाए तो वह भी हिंसा न हो पाए। जैनियों के कपड़े के मार्केट होते हैं पर उनके साधु साध्वियों को देखिए। अगले जन्म की तैयारी ऐसी होती है। इसी कंचन काया से हम जीवन में खेलते हैं और इसी से दोबारा मनुष्य जन्म मिलता है। इसलिए मन ऐसों निर्मल करो,ज्यों गंगा को नीर, पीछे पीछे हरि फिरैं ,कहते कबीर कबीर।
कथा के तृतीय दिवस मंत्री प्रतिनिधि लखन सिंह, अशोक सिंह, पृथ्वी सिंह, डा सुखदेव मिश्रा, चंद्रप्रताप सिंह, नगर पालिका अध्यक्ष नन्हींबाई अहिरवार, उपाध्यक्ष चौधरी राहुल जैन, रश्मि सोनी, देशराज यादव, बलराम यादव, विजय पटेल, विनोद राजहंस, इंद्रकुमार राय, अर्चना जैन, पूर्व विधायक धरमू राय, अजय तिवारी देवलचौरी, राजेंद्र पटैरिया, अनेक पार्षदगण और लगभग एक लाख का श्रोता समूह उपस्थित था। गांव गांव से उमड़ रहे श्रद्धालुओं के अनुसार लगातार पंडाल के आकार और बैठक व्यवस्था में वृद्धि की जा रही है। प्रशासनिक अधिकारियों, आयोजन समिति सदस्यों, स्वयं सेवकों द्वारा कथा स्थल पर की गई व्यवस्थाओं की प्रशंसा हो रही है।खुरई। त्याग ईश्वर का दूसरा रूप है। यदि त्याग वृत्ति आ जाए तो त्याग में शांति है, संग्रह में उतना आनंद नहीं जितना त्याग में है। मिल गया तो दूध बराबर, मांग लिया तो पानी, चूस लिया तो खून बराबर, यह संतों की वाणी। जीवन के अंत में देह के वस्त्र, कमर का कडोरा, हाथ पांव का तागा सब निकाल दिया जाता है, बस आत्मा और परमात्मा ही शेष रह जाता है।’ पूज्य संत श्री कमल किशोर नागर जी ने खुरई में प्रवाहित हो रही श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस त्याग और पुण्य की महिमा पर अपने अमृत वचनों में यह आशीर्वचन कहे।
व्यास गादी पर विराजमान संत श्री नागर जी ने आज मेले में खिलौना खरीद कर उसे खिलौने को बरतने की अमीर और गरीब के बच्चों की प्रवृत्ति से जीव आत्मा और देह की समानता करते हुए कहा कि रईस का बच्चा खिलौने को कुछ ही देर में खेलकर तोड़ फोड़ देता है लेकिन गरीब पिता का अभावों में पला बच्चा अपने पिता की शिक्षा पर चलता हुआ खिलौने से संभाल कर खेलता है और मन भर जाने पर ज्यों का त्यों पिता को वापस लौटा देता है ताकि पिता उसी मेले में खिलौने को बेच कर अपने परिवार को संध्या के भोजन की व्यवस्था कर सके। श्री नागर जी ने कहा कि हमारा जीवन और देह भी एक खिलौने की तरह है, इससे खूब खेल लो और जीवन के चौथे पहर अगले जन्म की तैयारी के लिए जस का तस वापस कर दो। जैसे कबीर ने किया। ध्रुव प्रह्लाद सुदामा ने ओढ़ी, दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया। एक दाग नहीं लगने दिया जीवन की चदरिया में। खराब नहीं होने दी और वापस लौटा दी। स्मरण रखिए कि संसार से जो हमने लिया उसे लौटाना भी है, फिर जो मिलेगा वह मुक्ति ही मिलेगी। इस कथा से हमें शिक्षा मिलती है कि जीवन में धंधा, रोजगार, नौकरी सब खेल खेलो और जीवन के चौथे आश्रम के लिए निवृत हो जाओ, मुक्ति की व्यवस्था करो। जा का वा को दीजिए जिसका जो कुछ होए। आखिरी में हाय हाय समाप्त हो हरि-हरि शेष रह जाए।
संत श्री नागर जी ने जैन दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां अहिंसा की बात होती है। असंचय और आस्तेय की चर्चा होती है। पहनने, खाने, रहने और रहनी में आत्मा को भी चोट न लग जाए, देखने में भी हिंसा हो सकती है ऐसा संयम भाव। हमारे चमक धमक भरे आचरण से ,पहनने ओढ़ने से भी किसी को आघात लग जाए तो वह भी हिंसा न हो पाए। जैनियों के कपड़े के मार्केट होते हैं पर उनके साधु साध्वियों को देखिए। अगले जन्म की तैयारी ऐसी होती है। इसी कंचन काया से हम जीवन में खेलते हैं और इसी से दोबारा मनुष्य जन्म मिलता है। इसलिए मन ऐसों निर्मल करो,ज्यों गंगा को नीर, पीछे पीछे हरि फिरैं ,कहते कबीर कबीर।
कथा के तृतीय दिवस मंत्री प्रतिनिधि लखन सिंह, अशोक सिंह, पृथ्वी सिंह, डा सुखदेव मिश्रा, चंद्रप्रताप सिंह, नगर पालिका अध्यक्ष नन्हींबाई अहिरवार, उपाध्यक्ष चौधरी राहुल जैन, रश्मि सोनी, देशराज यादव, बलराम यादव, विजय पटेल, विनोद राजहंस, इंद्रकुमार राय, अर्चना जैन, पूर्व विधायक धरमू राय, अजय तिवारी देवलचौरी, राजेंद्र पटैरिया, अनेक पार्षदगण और लगभग एक लाख का श्रोता समूह उपस्थित था। गांव गांव से उमड़ रहे श्रद्धालुओं के अनुसार लगातार पंडाल के आकार और बैठक व्यवस्था में वृद्धि की जा रही है। प्रशासनिक अधिकारियों, आयोजन समिति सदस्यों, स्वयं सेवकों द्वारा कथा स्थल पर की गई व्यवस्थाओं की प्रशंसा हो रही है।


By - sagartvnews
12-Dec-2022

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