दलित नेता बाबू जगजीवन राम जो PM बनने ही वाले थे, तीनों बार अपनों ने धोखा दिया
दलित नेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू जगजीवन राम तीन बार प्रधानमंत्री पद के करीब पहुंचे। एक बार तो जनसंघ भी उनके समर्थन में था, लेकिन उनके अपने साथियों ने ऐसा खेल किया कि उन्नीस सौ पछत्तर, उन्नीस सौ सतत्तर और उन्नीस सौ उन्यासी, तीन बार बाबू जगजीवन राम का नाम पीएम पद के लिए चला, पर वह पीएम बनते-बनते रह गए।
सबसे पहली बार 12 जून उन्नीस सौ पछत्तर को जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चुनावों में धांधली की वजह से इंदिरा गांधी की संसद सदस्यता रद्द कर दी, यानी अब इंदिरा प्रधानमंत्री पद पर नहीं रह सकती थीं। ऐसे में जगजीवन राम, जो पुराने कांग्रेसी थे, उन्हें उम्मीद थी कि इंदिरा उन्हें सत्ता की चाबी सौंप देंगी, लेकिन इंदिरा इसके लिए राजी नहीं हुईं। 25 जून उन्नीस सौ पछत्तर को देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई और जगजीवन राम के हाथ से पीएम बनने का पहला मौका निकल गया।
इसके बाद उनका कांग्रेस से मोह भंग भी हो गया।वहीं, उन्नीस सौ सतत्तर में इंदिरा ने जनवरी में इमरजेंसी वापस ले ली और चुनाव होने वाले थे। जगजीवन राम, राम विलास पासवान के जमाने से पहले के मौसम विज्ञानी थे, उन्होंने समझ लिया कि बयार किस तरफ है। 5 फरवरी उन्नीस सौ सतत्तर को बाबूजी ने पांच और कैबिनेट मंत्रियों के साथ कांग्रेस से अलग होकर एक नई पार्टी बनाई, जिसका नाम रखा कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी। बाद में उन्होंने अपनी पार्टी का विलय जनता पार्टी में कर दिया। इस साल उन्नीस सौ सतत्तर में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इंदिरा रायबरेली से और संजय अमेठी से चुनाव हार गए।
अब सवाल खड़ा हुआ कि पीएम कौन बनेगा? जगजीवन राम भी कुर्सी पर बैठना चाहते थे, लेकिन प्रधानमंत्री पद के दो दावेदार और थे - मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह। जनसंघ भी चाहता था कि जगजीवन राम पीएम बनें, लेकिन फिर भी वह पीएम नहीं बन सके।उन्नीस सौ उन्यासी में जब चौधरी चरण सिंह की सरकार से इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस खींच लिया, तो जगजीवन राम को फिर उम्मीद बंधी। तीन दावेदारों में से दो - मोरारजी और चौधरी चरण सिंह - प्रधानमंत्री बन चुके थे। जगजीवन राम के हिसाब से अब उनकी बारी थी।
लेकिन चौधरी चरण सिंह ने जगजीवन राम के समर्थन में पर्याप्त सांसदों की संख्या होने की जानकारी के बावजूद लोकसभा भंग करने की सिफ़ारिश तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी से कर दी। और नीलम संजीव रेड्डी ने चरण सिंह के इस्तीफे के बाद जगजीवन राम को सरकार बनाने का न्यौता नहीं भेजा।जगजीवन राम पीएम तो नहीं बन सके, लेकिन उनकी बेटी मीरा कुमार साल 2009 से 2014 तक लोकसभा अध्यक्ष रहीं। उन्होंने साल 2017 में राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा, लेकिन रामनाथ कोविंद से हार गईं।