बचपन कैद बूढ़े शरीर में, प्रोजेरिया की दर्दनाक कहानी ! चार बच्चे झेल रहे ऑरो जैसी बीमारी !
बचपन का मतलब होता है मासूमियत, खेल और हंसी... लेकिन रायसेन जिले के सालेरा गांव में चार बच्चे ऐसे हैं जिनका बचपन बुढ़ापे के दर्द में कैद हो गया है। आपने फ़िल्म “पा” में अमिताभ बच्चन को एक बच्चे ऑरो के किरदार में देखा होगा — जो बचपन में ही बूढ़ा दिखता है। वही फ़िल्मी कहानी अब रायसेन के इस छोटे से गांव में हकीकत बन चुकी है। एमपी के रायसेन जिले के सालेरा गांव में प्रोजेरिया नामक आनुवंशिक बीमारी ने एक ही परिवार के तीन बच्चों को अपनी चपेट में ले लिया है। इस बीमारी से पहले ही एक बच्चा जान गंवा चुका है। यही नहीं, गांव की एक और युवती भी इस दुर्लभ बीमारी से पीड़ित है। दुनियाभर में जहां प्रोजेरिया के सिर्फ 400-500 मरीज हैं, वहीं रायसेन के इस एक गांव में ही चार मामले सामने आ चुके हैं।
गांव के करण सिंह बैरागी की बेटी सुनीता 22 इस बीमारी की शिकार हुई थी। इसके बाद रंजीत सिंह बैरागी के तीन बच्चों में भी वही लक्षण दिखे। बड़ी बेटी राजकुमारी 18, छोटी रोशनी 15 और बेटा राजकुमार, जो सिर्फ 7 साल की उम्र में दुनिया छोड़ गया। राजकुमारी चल नहीं पाती, रोशनी अक्सर बीमार रहती है। मेरे पांच बच्चों में से दो तो बिल्कुल ठीक हैं, लेकिन तीनों छोटे इस बीमारी की चपेट में आ गए। जन्म के कुछ महीनों बाद ही बच्चे बूढ़े दिखने लगे। राजकुमार तो बीमारी से लड़ते-लड़ते चला गया। डॉ. प्रतीक शर्मा, शिशु रोग विशेषज्ञ बताते हैं कि सात साल पहले बच्चों की जांच में प्रोजेरिया जैसे लक्षण पाए गए थे।
यह बहुत दुर्लभ बीमारी है, लेकिन अब तक बड़े स्तर पर जांच नहीं हो सकी। केंद्र सरकार की नेशनल पॉलिसी फॉर रेयर डिजीज के तहत भी इन बच्चों को कोई लाभ नहीं मिल पाया है। प्रोजेरिया को हचिंसन-गिलफोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम कहा जाता है। LMNA जीन में म्यूटेशन के कारण यह बीमारी होती है, जिससे बच्चों का शरीर तेजी से बूढ़ा होने लगता है। चेहरे पर झुर्रियां, बाल झड़ना और त्वचा ढीली पड़ना इसके मुख्य लक्षण हैं। आम तौर पर यह बच्चे 13 से 15 साल की उम्र तक ही जीवित रहते हैं। इलाज आज भी दुनिया के लिए एक चुनौती बना हुआ है।