लग्ज़री गाड़ियां छोड़ीं, बैलगाड़ी अपनाई! रतलाम में जैन समाज ने निभाई सदियों पुरानी परंपरा
आज के आधुनिक दौर में जहां लोग लग्ज़री गाड़ियों और हाईटेक सुविधाओं के आदी हो चुके हैं, वहीं मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में एक अनोखी और आस्था से जुड़ी तस्वीर देखने को मिली। पौष माह की अमावस्या पर आयोजित अति प्राचीन केसरियानाथ जैन तीर्थ बिबड़ौद मेले में जैन समाज ने शाही सवारी छोड़कर सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रखा और बैलगाड़ियों में सवार होकर प्रभु के दर्शन के लिए पहुंचा। रतलाम से करीब 5 किलोमीटर दूर, रतलाम–बाजना मार्ग पर स्थित बिबड़ौद जैन तीर्थ पर सोमवार को श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। पौष अमावस्या के पावन अवसर पर यहां विशाल मेला लगा, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। जैन समाज के लोग अपने परिवार के साथ लक्ज़री कारों को घर पर छोड़, बैलगाड़ियों में बैठकर ढोल-थाली की थाप और प्रभु की जय-जयकार करते हुए तीर्थ पहुंचे।
तीर्थ परिसर में भगवान आदिनाथ प्रभु के दर्शन-वंदन किए गए। प्रभु की प्रतिमा का सोने, चांदी और डायमंड वर्क से भव्य श्रृंगार किया गया। साथ ही मंदिर में विराजमान पार्श्व प्रभु और मणिभद्र देव का भी आकर्षक श्रृंगार किया गया। दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं का तिलक लगाकर स्वागत किया गया। इस मेले की सबसे खास बात यह रही कि यह परंपरा केवल दिखावा नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक आस्था से जुड़ी है। बैलगाड़ी में सवार श्रद्धालुओं का कहना है कि यह परंपरा राजा-महाराजाओं के समय से चली आ रही है। उस दौर में बैलगाड़ी ही आवागमन का मुख्य साधन थी। आज भी श्रद्धालु 400 से 500 रुपए प्रति किलोमीटर किराए पर बैलगाड़ी लेकर इसी परंपरा का पालन करते हैं, क्योंकि इसमें अलग ही आनंद और अपनापन महसूस होता है।
तीर्थ के ट्रस्टी पारस भंडारी ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान केसरियानाथ ऋषभदेव जी का चिन्ह बैल रहा है। इसी वजह से समाजजन आज भी उसी परंपरा को निभाते हुए बैलगाड़ी से तीर्थ यात्रा करते हैं। यह मेला सिर्फ जैन समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य समाजों के लोग भी बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। मेले में खान-पान के स्टॉल, बच्चों के मनोरंजन के साधन और खासतौर पर बिना मशीन से चलने वाले लकड़ी के झूले आकर्षण का केंद्र रहे। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी पूरे उत्साह के साथ मेले का आनंद लेते नजर आए।