नियम आम जनता के लिए, छूट बिजली कर्मचारियों के लिए? खुलेआम उड़ा नियमों का मज़ाक
नियम आम जनता के लिए, छूट बिजली कर्मचारियों के लिए? खुलेआम उड़ा नियमों का मज़ाक
एमपी के शुजालपुर की सड़कों पर आज जो नज़ारा देखने को मिला, उसने न सिर्फ प्रशासन बल्कि पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। विद्युत मंडल के कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलन के नाम पर रैली निकाली, लेकिन इस दौरान नियम-कानून को खुलेआम ताक पर रख दिया गया। सरकारी नियम साफ कहते हैं—कोई भी शासकीय कर्मचारी आंदोलन, प्रदर्शन या रैली के दौरान सरकारी वाहन, सरकारी ईंधन या संसाधनों का उपयोग नहीं कर सकता। लेकिन शुजालपुर में इन नियमों की खुलेआम अनदेखी होती दिखी।
रैली के दौरान सरकारी वाहनों की कतारें सड़कों पर दौड़ती रहीं। सरकारी ईंधन का इस्तेमाल हुआ और वे संसाधन, जिनका उपयोग आम जनता की सेवा—बिजली फॉल्ट सुधार और आपूर्ति बहाली—के लिए होना चाहिए था, वे आंदोलन की शोभा बढ़ाते नजर आए। अब सवाल यह उठता है कि यह खुली छूट आखिर किसके आदेश से दी गई? क्या ये वही वाहन नहीं थे, जिनसे उपभोक्ताओं की समस्याएं हल होनी चाहिए थीं? जब आम नागरिक नियम तोड़ता है, तो तुरंत चालान और कार्रवाई होती है। लेकिन जब सरकारी कर्मचारी नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं, तो प्रशासन की चुप्पी क्यों?
क्या प्रशासन की आंखें बंद थीं या फिर सब कुछ जानबूझकर अनदेखा किया गया? यह पहला मौका नहीं है जब विद्युत मंडल विवादों में घिरा हो। कुछ ही दिन पहले शुजालपुर में बिजली बिलों में गड़बड़ी के गंभीर आरोप सामने आए थे। आरोप थे कि जो उपभोक्ता पैसे देता है, उसका बिल “ठीक” कर दिया जाता है और जो विरोध करता है, उसके हाथ में थमा दिया जाता है भारी-भरकम बिल। कभी बिल घोटाले के आरोप, कभी सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग और अब आंदोलन की आड़ में नियमों का उल्लंघन—ये घटनाएं लगातार एक ही सवाल को जन्म देती हैं। आखिर विद्युत मंडल बार-बार विवादों में क्यों आता है?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या इस पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी दबाव और फाइलों के बोझ तले दबा दिया जाएगा? शुजालपुर की जनता अब सिर्फ बिजली नहीं चाहती, बल्कि जवाब, जवाबदेही और ठोस कार्रवाई की मांग कर रही है।