कलेक्टर–आयुक्त ने खुद पीकर परखा पानी, इंदौर हादसे का असर, जबलपुर में प्रशासन अलर्ट
इंदौर में दूषित पानी पीने से गई जानों के बाद अब मध्यप्रदेश के अन्य जिलों में भी प्रशासन की नींद टूटती नजर आ रही है। इसी कड़ी में जबलपुर नगर निगम और जिला प्रशासन अचानक एक्शन मोड में दिखाई दिया। वर्षों से शिकायतों और आशंकाओं के बीच चल रही पेयजल व्यवस्था की हकीकत जानने के लिए कलेक्टर राघवेंद्र सिंह और नगर निगम आयुक्त राम प्रकाश अहिरवार ने शहर के प्रमुख जल शोधन संयंत्रों का औचक निरीक्षण किया।
कलेक्टर और निगमायुक्त ने रमनगरा, भोंगाद्वार और गौर नदी स्थित जल शोधन संयंत्रों का जायजा लिया। निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने सिर्फ कागजी रिपोर्टों पर भरोसा नहीं किया, बल्कि खुद पानी पीकर उसकी शुद्धता परखी। यही नहीं, उनकी मौजूदगी में पेयजल की लैब टेस्टिंग भी कराई गई, जिसमें पानी को विभिन्न मानकों पर संतोषजनक बताया गया।
निरीक्षण के दौरान कलेक्टर राघवेंद्र सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब पेयजल की डेली जांच अनिवार्य होगी। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जल स्रोतों, पाइपलाइनों और टंकियों में किसी भी प्रकार के लीकेज या प्रदूषण की संभावना को तुरंत समाप्त किया जाए। कलेक्टर ने कहा कि नागरिकों तक पहुंचने वाला पानी हर हाल में संक्रमण मुक्त और मानक स्तर का होना चाहिए, किसी भी तरह की लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अधिकारियों ने बताया कि वर्तमान में जबलपुर में प्रतिदिन 23 पानी के सैंपल टेस्ट किए जा रहे हैं और लगभग 300 एमएलडी पानी विभिन्न संयंत्रों से शहर में सप्लाई किया जा रहा है। निरीक्षण के दौरान नगर निगम का तकनीकी अमला भी सतर्क नजर आया और कई जगह व्यवस्थाओं की बारीकी से जांच की गई।
हालांकि, इस अचानक सक्रियता को लेकर शहरवासियों के मन में सवाल भी उठ रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह सतर्कता स्थायी रहेगी या फिर किसी बड़े हादसे के बाद की अस्थायी कार्रवाई बनकर रह जाएगी? इंदौर की त्रासदी ने यह साफ कर दिया है कि पेयजल जैसे बुनियादी मुद्दे पर जरा-सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जबलपुर प्रशासन की यह सख्ती सिर्फ निरीक्षण तक सीमित रहती है या वास्तव में नागरिकों को सुरक्षित और शुद्ध पानी देने की दिशा में एक ठोस बदलाव साबित होती है।