Sagar | कर-दर्शन पर स्टेट लेवल टैक्स कॉन्फ्रेंस में कुलपति ने GST, पेट्रोल टैक्स पर कहीं बड़ी बांते
टैक्स बार एसोसिएशन सागर और मध्य प्रदेश टैक्स लॉ बार एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में मकरोनिया स्थित निजी होटल में राज्य स्तरीय टैक्स कॉन्फ्रेंस कर-दर्शन का आयोजन किया गया। इस सेमिनार का मुख्य उद्देश्य कर सलाहकारों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर कानूनों के जटिल प्रावधानों से अवगत कराना और सरकारी राजस्व संग्रहण में पारदर्शिता लाना था। कार्यक्रम में प्रदेश भर के लगभग 200 कर विशेषज्ञों और सदस्यों ने शिरकत की। पूरे कार्यक्रम का कुशल संचालन सीए स्वप्निल शुक्ला द्वारा किया गया।
कॉन्फ्रेंस के विभिन्न तकनीकी सत्रों में देश के विख्यात वक्ताओं ने अपनी बात रखी। इंदौर से आए जीएसटी विशेषज्ञ अमित दवे ने जीएसटी अपील ट्रिब्यूनल के नियमों और सुओ मोटो पंजीयन निरस्तीकरण की प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला। वहीं, आयकर विशेषज्ञ सीए अर्पित गौर ने पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के जरिए कैपिटल गेन टैक्स की बारीकियां समझाई। उन्होंने विवादित मामलों में ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रभावी बहस और तकनीकी जवाब पेश करने के गुर भी सिखाए।
दिल्ली से आए सीए अभिषेक जैन ने पुराने और नए आयकर अधिनियम 2025 का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया, जबकि नई दिल्ली के जीएसटी विशेषज्ञ सीए अभिषेक राजा ने धारा 73, 74 और 74 के तहत पेनल्टी प्रावधानों की व्याख्या की। विशेष रूप से उन्होंने बीड़ी और सिगरेट जैसे तंबाकू उत्पादों पर जीएसटी की देयता पर तकनीकी चर्चा की।
कार्यक्रम की शुरुआत में टैक्स बार एसोसिएशन सागर के अध्यक्ष एड. संतोष कुमार दुबे और मध्य प्रदेश टैक्स लॉ बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एड. ए.के. लखोटिया ने स्वागत भाषण दिया। संचालन सीए स्वप्निल शुक्ला द्वारा किया गया। सचिव एड. देवेंद्र नामदेव ने बताया कि इस तरह के आयोजनों से न केवल कर सलाहकारों का ज्ञानवर्धन होता है, बल्कि राष्ट्र निर्माण के राजस्व संग्रहण में भी सुगमता आती है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वायएस ठाकुर रहे। अपने संबोधन में उन्होंने कर प्रणाली और सरकारी नीतियों पर बेबाक टिप्पणी की। प्रो. ठाकुर ने कहा कि सरकार को टैक्स की दरें न्यूनतम रखनी चाहिए ताकि मध्यम और निम्न वर्ग पर बोझ न पड़े। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि जनता से कई स्तरों पर टैक्स लिया जाता है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के मामले में उन्हें वह नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं। एक देश-एक टैक्स के नारे पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान जीएसटी प्रणाली इस मूल भावना से भिन्न नजर आती है, जिस पर पुनः विचार की आवश्यकता है।