सागर को एक और पद्मश्री, पुरानी युद्ध कला को बचाया, लाठी-तलवार की परंपरा वाले भगवानदास रैकवार हैं मिसाल
संघर्ष, साधना और संस्कृति संरक्षण की अद्भुत मिसाल बने मध्यप्रदेश के सागर जिले के भगवानदास रैकवार को पद्म श्री 2026 से सम्मानित किया गया है। गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म पुरस्कारों की सूची में उनका नाम शामिल होते ही पूरे बुंदेलखंड में खुशी की लहर दौड़ गई। भारत सरकार ने उन्हें अनसंग हीरोज श्रेणी में यह सम्मान प्रदान किया है, जो उन लोगों को दिया जाता है, जिन्होंने बिना किसी प्रचार के देश और समाज के लिए असाधारण कार्य किए हों। 83 वर्षीय भगवानदास रैकवार बुंदेली युद्ध कला के प्रमुख संरक्षक माने जाते हैं।
उन्होंने वर्ष 1970 में इस प्राचीन शास्त्र युद्ध शैली की विधिवत शिक्षा ली और तभी से अपना पूरा जीवन इसके संरक्षण और प्रचार में समर्पित कर दिया। हालात ऐसे रहे कि इस कला को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने स्टेट बैंक की सुरक्षित नौकरी तक छोड़ दी। मात्र दसवीं तक पढ़े भगवानदास रैकवार ने यह साबित कर दिया कि जुनून और समर्पण हो तो डिग्रियां मायने नहीं रखतीं।
भगवानदास रैकवार दो भाइयों में बड़े हैं। उनका परिवार भी सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा रहा है। उनके बेटे राजकुमार रैकवार रंग थिएटर ग्रुप से जुड़े हुए हैं और रंगमंच के माध्यम से लोकसंस्कृति को आगे बढ़ा रहे हैं। खुद भगवानदास रैकवार भी 1982 में बंसी कॉल के जरिए थिएटर से जुड़े और बाद में थिएटर कलाकारों को युद्ध शैली का प्रशिक्षण देने लगे, जिससे मंच प्रस्तुतियों में पारंपरिक रंग और प्रभाव देखने को मिला।
बुंदेली युद्ध कला कोई साधारण खेल नहीं, बल्कि एक शास्त्र युद्ध कला है, जिसमें तलवार, भाला, त्रिशूल, ढाल, लाठी और झेलम जैसी पारंपरिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाता है। भगवानदास रैकवार अब तक करीब 55 लड़के और लड़कियों को नियमित रूप से प्रशिक्षण दे रहे हैं। इतना ही नहीं, अपने अब तक के सफर में वे लगभग 5000 से अधिक बच्चों और युवाओं को इस युद्ध शैली की बारीकियां सिखा चुके हैं।
उनका योगदान सिर्फ शारीरिक प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने युवाओं में अनुशासन, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक गौरव की भावना भी विकसित की। बुंदेलखंड की यह पारंपरिक कला एक समय विलुप्त होने की कगार पर थी, लेकिन भगवानदास रैकवार जैसे साधकों की वजह से आज यह फिर से पहचान बना रही है। पद्म श्री 2026 से सम्मानित होना न केवल भगवानदास रैकवार की व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि यह पूरे मध्य प्रदेश और खासकर बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए गर्व की बात है।