7 साल बाद खुला पाकिस्तान की जेल से उम्मीदों का दरवाजा,बहन के संघर्ष,आंसुओं की दास्तां
7 साल पहले पता चला की बेटा पाकिस्तान की जेल में बंद है। माँ ने उम्मीद नहीं छोड़ी, उसे यकीन था की उसका बेटा ज़िंदा है और उसके आने का इन्तजार भी आँखों में था। बहन ने जो हो सकता था वह कुछ किया ताकि उसका भाई लौट आये, किसी तरह से बस आ जाये। यह एक बहन के कठिन संघर्ष की मार्मिक दास्तां हैं। जब पूरे 7 साल बाद एमपी के बालाघाट जिले के प्रसन्नजीत के लिए पाकिस्तान की जेल के दरवाजे खुल सके हैं। जी हाँ बालाघाट जिले के खैरलांजी निवासी प्रसन्नजीत रंगारी की जो बीते 7 सालों तक पाकिस्तान की जेल में सुनील अदे बनकर बंद रहा। 31 जनवरी को जब पाकिस्तान से सात भारतीय कैदियों की रिहाई हुई,
तब उनमें एक नाम ऐसा भी था, जिसने बालाघाट के एक साधारण से घर में खुशियों के साथ आंसुओं की बाढ़ ला दी। रविवार 1 फरवरी की दोपहर करीब 1 बजे फोन की घंटी बजती है। आवाज़ सुनाई दी कि आपके भाई को पाकिस्तान से रिहा कर दिया गया है। यह फोन बालाघाट के खैरलांजी थाना से आया था। जिसने बहन संघमित्रा को आंसूओ में डूबो दिया, लेकिन इस बार आँखों से बहे ये आंसू गम के नही। बल्कि खुशी के पलो से भरे थे। जिसमें एक बहन के संघर्ष की जीत झलक रही थी। सात साल बाद जब बहन ने भाई की आवाज सुनी, तो पहचान की डोर टूट चुकी थी। भाई बोला उसके पास टिकट नहीं है। तुम ही मुझे लेने आ जाओ। यह सुनकर संघमित्रा फूट-फूट कर रो पड़ी। क्योकि यह रिहाई आसान नहीं थी। संघमित्रा ने सालों तक थानों, कलेक्टर कार्यालयों, नेताओं और मंत्रालयों के चक्कर लगाए। 2021 में जब पहली बार पता चला कि भाई जिंदा है और पाकिस्तान की जेल में बंद है। तब से वह अकेली जंग लड़ती रही। बीते साल भाई के नाम लिखी उसकी चिट्ठी जब मीडिया में छपी, तब जाकर मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में आया।
संघमित्रा के मुताबिक भाई प्रसन्नजीत कभी पढ़ाई में तेज था। पिता लोपचंद रंगारी ने कर्ज लेकर उसे जबलपुर से बी.फॉर्मेसी पढ़ाया। लेकिन मानसिक बीमारी ने ज़िंदगी की दिशा बदल दी। 2017-18 में वह लापता हुआ, 2019 में पाकिस्तान के बाटापुर से हिरासत में लिया गया। बिना आरोप, बिना पहचान के वह पाकिस्तान की जेल में कैद हो गया। विडंबना देखिये जिस दिन वेरिफिकेशन के दस्तावेज आए, उसी दिन पिता की जान चली गई। लेकिन मां आज भी मानती रही कि बेटा कहीं जिंदा है। प्रसन्नजीत अमृतसर के गुरु नानक देव अस्पताल और रेडक्रॉस भवन में है। छह भारतीय अपने घर लौट चुके हैं। लेकिन आर्थिक तंगी के चलते प्रसन्नजीत अब भी इंतजार में है। यह सिर्फ रिहाई नहीं एक बहन के संघर्ष, पिता के अधूरे इंतजार और एक मां की उम्मीद की जीत है।