निर्मला सप्रे केस में हाईकोर्ट में पेश हुई रिपोर्ट, जवाब अयोग्यता पर फैसला लेने की कोई समय-सीमा नहीं
मध्य प्रदेश की सियासत में हलचल मचाने वाले निर्मला सप्रे दलबदल केस में अब कानूनी मोर्चे पर नई बहस छिड़ गई है। सागर जिले की बीना सीट से कांग्रेस के टिकट पर विधायक बनीं निर्मला सप्रे के मामले में मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अपनी स्टेटस रिपोर्ट पेश कर दी है—और साफ कहा है कि अयोग्यता पर फैसला लेने की कोई तय समय-सीमा नहीं है।
दरअसल, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि स्पीकर दलबदल संबंधी याचिकाओं पर जानबूझकर देरी कर रहे हैं। शुक्रवार 27 फरवरी को सुनवाई प्रस्तावित थी, लेकिन मामला टल गया। अब इस पर मार्च के अंतिम सप्ताह में सुनवाई होगी। निर्मला सप्रे ने 5 मई को लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर मुख्यमंत्री मोहन यादव की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता ले ली थी। हालांकि, उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया। इसी को लेकर उनकी अयोग्यता की मांग उठी।
विधानसभा सचिवालय के प्रमुख तर्क, स्पीकर का अधिकार सर्वोपरि – संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता पर निर्णय लेने का विशेष अधिकार अध्यक्ष के पास है। 3 महीने की समय-सीमा अनिवार्य नहीं – कीशम मेघचंद्र मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को ‘निर्देशात्मक’ बताया गया, बाध्यकारी नहीं। कोई तात्कालिक आपात स्थिति नहीं – विधानसभा का कार्यकाल शेष है, इसलिए देरी को अवैध नहीं माना जा सकता। प्रक्रिया जारी है – संबंधित पक्षों को नोटिस जारी, जवाब और साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया चल रही है।
सचिवालय ने यहां तक कहा कि ऑपरेशन सफल रहा, मरीज मर गया जैसी स्थिति इस केस में लागू नहीं होती, क्योंकि कार्यवाही अभी जारी है। अब नजरें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। क्या अदालत स्पीकर को समय-सीमा तय करने का निर्देश देगी? या विधानसभा का पक्ष भारी पड़ेगा? मध्य प्रदेश की राजनीति में यह केस आगे और क्या मोड़ लेता है, यही बड़ा सवाल है।