Sagar- होली पर अनरय में की परंपरा, जहां फाग मंडली के रंगों से भर जाती है सूनी जिंदगी !
बुंदेलखंड में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि टूटे दिलों को जोड़ने की परंपरा भी है. यहां अगर किसी परिवार में मृत्यु हो जाए तो पूरे एक साल तक घर में कोई शुभ काम नहीं होता. शादी-ब्याह, ढोल-नगाड़े, सब वर्जित रहता है. घर का माहौल जैसे ठहर सा जाता है. लेकिन जैसे ही होली आती है, तस्वीर बदल जाती है. धुरेड़ी से पंचमी तक गांव-गांव फाग की मंडलियां निकलती हैं. ये मंडलियां खास तौर पर उन घरों में जाती हैं, जहां पिछले साल किसी का निधन हुआ हो. वहां होली और कान्हा के गीत गाती हैं, रंग-गुलाल लगाती हैं और उस परिवार को फिर से समाज की मुख्य धारा में शामिल करती हैं.
लोक कलाकार और पद्मश्री स्वर्गीय राम सहाय पांडे के पुत्र संतोष पांडे बताते हैं कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. गांव वाले फाग मंडली बनाकर शोकाकुल परिवार के घर जाते हैं. वहां ढोलक, मृदंग, मंजीरे और नगाड़े की थाप पर होली गीत गाए जाते हैं. गीतों के जरिए संदेश दिया जाता है जो होना था, वह हो गया. मृत्यु अटल है. अब दुख को पीछे छोड़कर जीवन की ओर लौटो
बुंदेलखंड में पंचमी को पचरंगी भी कहा जाता है. मान्यता है कि शरीर पांच तत्वों से बना है, इसलिए पंचमी के दिन पांच रंग लगाकर नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक दिया जाता है. एक साल तक जिन घरों में शादी-ब्याह जैसे काम रुके रहते हैं, वे होली के बाद फिर से शुरू हो सकते हैं. फाग मंडली का जाना जैसे एक संकेत होता है अब ग़म की अवधि खत्म, जीवन फिर से रंगों से भरने का समय आ गया.