जीवंत हुई फगुआ परंपरा, गांव-गांव घूमकर आदिवासी मांग रहे फगुआ, 5 दिन बाद होगा सामूहिक भोज
मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के आदिवासी अंचलों में इन दिनों एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा देखने को मिल रही है। होली के बाद शुरू होने वाली फगुआ परंपरा इन दिनों पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाई जा रही है। इस परंपरा में आदिवासी समाज के लोग गांव-गांव जाकर पारंपरिक नृत्य और गीतों के माध्यम से लोगों से फगुआ के रूप में अनाज और अन्य सामग्री का सहयोग लेते हैं। दरअसल, होली के बाद शुरू होने वाली यह परंपरा करीब पांच दिनों तक चलती है। इस दौरान आदिवासी युवक-युवतियां समूह बनाकर आसपास के गांवों में पहुंचते हैं। वे पारंपरिक वेशभूषा में ढोल-मांदर की थाप पर नाचते-गाते हैं और गांव के लोगों से फगुआ के रूप में अनाज, दाल या अन्य सामग्री दान में लेते हैं।
इस परंपरा का सबसे खास पहलू यह है कि इसमें किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं होता। जो भी अनाज और सामग्री फगुआ के रूप में मिलती है, उसे इकट्ठा कर बाद में बाजार में बेचा जाता है। उससे जो राशि मिलती है, उससे पूरे आदिवासी समाज के लिए सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा सिर्फ उत्सव मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में आपसी सहयोग, भाईचारा और एकजुटता का संदेश भी देती है। फगुआ मांगने के दौरान गांव के लोग भी पूरे उत्साह से सहयोग करते हैं और इस परंपरा को आगे बढ़ाने में भागीदारी निभाते हैं।
फगुआ के इन पांच दिनों में गांवों का माहौल पूरी तरह उत्सवमय हो जाता है। ढोल-मांदर की गूंज, पारंपरिक नृत्य और लोकगीतों से पूरा क्षेत्र गूंज उठता है। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं भी इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं। पांच दिन तक चलने वाले इस आयोजन के बाद अंतिम दिन आदिवासी समाज के लोग सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं, जिसमें पूरे समाज के लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। इस तरह यह परंपरा न केवल सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखती है, बल्कि समाज में सहयोग और एकता की भावना को भी मजबूत करती है।