महिलाओं ने खुद जलाई होलिका, पुरुषों की एंट्री पर रोक, नारी शक्ति की अनोखी होली
मध्यप्रदेश के रीवा में चैत्र नवरात्रि के अवसर पर एक अनोखी और गौरवशाली परंपरा देखने को मिलती है, जिसे ‘महिलाओं की होली’ के नाम से जाना जाता है। फाल्गुन की होली के बाद भी यहां रंग, उत्साह और आस्था का यह पर्व पूरे जोश के साथ मनाया जाता है। इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि इसमें पुरुषों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक रहती है। बच्चियों से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक, सभी एकत्रित होकर इस आयोजन में भाग लेती हैं और पूरी जिम्मेदारी खुद निभाती हैं। होलिका दहन से लेकर पूजा-अर्चना तक हर रस्म केवल महिलाएं ही करती हैं।
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन महिलाएं विधि-विधान से होलिका दहन करती हैं। जलती हुई होलिका के चारों ओर महिलाएं बघेली फाग और लोकगीत गाती हैं और ईश्वर से समाज में सुख-शांति और समृद्धि की कामना करती हैं। यह दृश्य न केवल आध्यात्मिक होता है, बल्कि नारी शक्ति के एकजुट स्वरूप को भी दर्शाता है। स्थानीय महिलाओं के अनुसार, यह परंपरा केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समाज में सद्भाव, प्रेम और भाईचारे को बनाए रखने का माध्यम है। बुजुर्ग महिलाओं के मार्गदर्शन में युवा पीढ़ी की बेटियां भी इस परंपरा को सीख रही हैं और आगे बढ़ा रही हैं।
होलिका दहन के बाद महिलाएं एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर नव संवत्सर की शुभकामनाएं देती हैं। पूरे आयोजन के दौरान माहौल भक्ति, उत्साह और उल्लास से भरा रहता है। आज के आधुनिक दौर में जहां कई पारंपरिक रीति-रिवाज धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं, वहीं रीवा की महिलाएं इस अनूठी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि इस तरह के आयोजन न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करते हैं, बल्कि महिलाओं की नेतृत्व क्षमता और सामाजिक भूमिका को भी मजबूत बनाते हैं। रीवा की यह महिलाओं की होली आज नारी शक्ति, आस्था और संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन चुकी है, जो हर साल नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही है।