Sagar-गढ़पहरा की अनगढ़ देवी का चमत्कारी धाम, जहां बिना स्वरूप 500 सालो से दर्शन दे रही माई
गढ़पहरा किले की प्राचीन पहाड़ियों के बीच, प्रकृति की गोद में विराजमान है मां जगतजननी का एक अद्भुत और रहस्यमयी धाम—अनगढ़ देवी मंदिर। यहां मां दुर्गा का स्वरूप न तो तराशा गया है और न ही किसी आकार में बंधा है, फिर भी आस्था की ज्योति सदियों से यहां अखंड रूप से प्रज्वलित है। यही कारण है कि भक्त उन्हें “अनगढ़ देवी” के नाम से श्रद्धापूर्वक पुकारते हैं।
कभी यह स्थान दुर्गम पथों और घने वनांचल से घिरा हुआ था, जहां पहुंचना तपस्या से कम नहीं था। दांगी शासकों के समय से ही यह पवित्र स्थल आस्था का केंद्र रहा है। माना जाता है कि किले के निर्माण के साथ ही मां की स्थापना भी हुई थी। आज भले ही नेशनल हाईवे 44 से यहां तक पहुंचना सरल हो गया हो, लेकिन उस काल की कठिन साधना और श्रद्धा की गूंज आज भी वातावरण में महसूस की जा सकती है
INTACH सागर के संयोजक डॉ. रजनीश जैन बताते हैं कि, 'गढ़पहरा किले का इतिहास गौड़ और दांगी राजाओं से जुड़ा है. इस किले का निर्माण 12-13 वीं शताब्दी में गौड़ राजाओं ने कराया था. एक विशाल क्षेत्रफल वाले पहाड़ के रास्ते काफी दुर्गम थे. अनगढ़ देवी की स्थापना किले के निर्माण के साथ किए जाने की संभावना है.
मंदिर के पुजारी विवेक वैष्णव बताते है कि, ये मंदिर राजशाही जमाने का मंदिर है. यहां किला परिसर में स्थापित हनुमान मंदिर और अनगढ़ देवी मंदिर को उसी समय का माना जाता है. पहले यहां पहुंचने के लिए रास्ता नहीं था, काफी मुश्किल से श्रृद्धालु पहुंचते थे, बार-बार भटक जाते थे. माता का स्वरूप भी अनगढ़ था. मूर्ति को ना तो तराशा गया और ना ही कोई स्वरूप दिया गया. इसलिए अनगढ़ देवी कहा गया. बाद में यहां मां के 9 स्वरूप वाली प्रतिमाएं स्थापित की गयी. वहीं, श्रद्धालु बृजेश सेन बताते है कि, 'अनगढ़ माता हमारी कुलदेवी हैं. हम लोग हर नवरात्रि पर यहां आते हैं, हमारे परिवार के मुंडन संस्कार भी यहीं होते हैं.