तारा बुआ को मुस्लिम पड़ोसियों ने दिया कंधा, हिंदू रीति से हुआ अंतिम संस्कार, कौमी एकता की मिसाल
मध्य प्रदेश के सागर संभाग के दमोह जिले से इंसानियत और कौमी एकता की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने हर किसी का दिल छू लिया। यहां एक बुजुर्ग हिंदू महिला तारा बाई तिवारी, जिन्हें पूरे इलाके में ‘तारा बुआ’ के नाम से जाना जाता था, के निधन के बाद जो नजारा देखने को मिला, उसने समाज को एक मजबूत संदेश दिया। अष्टमी के दिन तारा बुआ का अचानक निधन हो गया। उनके निधन की खबर फैलते ही पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। उनके घर पर हिंदू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के सैकड़ों लोग भी पहुंचे। हर कोई अपनी ‘बुआ’ को अंतिम विदाई देने आया था।
सबसे खास बात यह रही कि तारा बुआ की अंतिम यात्रा में हिंदू-मुस्लिम एकता की अनोखी मिसाल देखने को मिली। मुस्लिम पड़ोसियों ने न सिर्फ उनकी अर्थी को कंधा दिया, बल्कि पूरे सम्मान के साथ उन्हें श्मशान घाट तक पहुंचाया। जिस गली से अंतिम यात्रा गुजरी, वहां लोगों की आंखें नम थीं और हर कोई उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा था। स्थानीय लोगों का कहना है कि तारा बुआ ने कभी भी धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया। वे सभी के सुख-दुख में बराबर शामिल होती थीं, यही वजह है कि आज हर धर्म के लोग उन्हें अपना मानते थे।
मुक्तिधाम पर भी यही एकता देखने को मिली, जहां बड़ी संख्या में दोनों समुदायों के लोग मौजूद रहे। परिवार के सदस्यों ने बताया कि इस दुख की घड़ी में मुस्लिम भाइयों ने आगे बढ़कर हर संभव सहयोग किया और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में भी साथ दिया। स्थानीय मुस्लिम युवकों—मोहसिन खान, मुबारक खान और उनके साथियों—ने पूरे सम्मान के साथ ‘तारा बुआ’ को अंतिम विदाई दी। यह दृश्य न केवल भावुक कर देने वाला था, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा भी बना। आज जब समाज में अक्सर धर्म के नाम पर दूरी की बातें होती हैं, ऐसे में दमोह की यह तस्वीर एक सशक्त संदेश देती है—इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।