सागर- देवरी में आस्था का महासागर, बूढ़ी खेर माई की जयकारों के बीच विदाई, बाना साधना ने खींचा ध्यान
सागर जिले के देवरी कलां में चैत्र नवरात्रि के समापन पर आस्था, परंपरा और कठोर साधना का अद्भुत संगम देखने को मिला। नगर की आराध्य बूढ़ी खेर माई की जंवारा विसर्जन यात्रा में हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। “जय माता दी” के गूंजते जयकारों के बीच मां को भावभीनी विदाई दी गई। नौ दिनों तक चले पूजन-अर्चना के बाद निकली यह भव्य शोभायात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई विसर्जन स्थल तक पहुंची। इस दौरान श्रद्धालु भक्ति गीतों पर झूमते नजर आए, वहीं महिलाएं सिर पर जंवारे रखकर श्रद्धा के साथ आगे बढ़ती रहीं। कई भक्त दंडवत होकर माता से अपनी मनोकामनाएं मांगते दिखाई दिए।
इस आयोजन की सबसे खास झलक रही बुंदेली परंपरा के तहत की जाने वाली बाना साधना। कई श्रद्धालुओं ने अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों—चेहरे, गाल और पीठ—में नुकीले बाना धारण कर आस्था का अनोखा प्रदर्शन किया। यह दृश्य जहां आम लोगों के लिए आश्चर्य का विषय था, वहीं भक्त इसे मां की कृपा और शक्ति का प्रतीक मानते हैं। इस वर्ष मुआर रोड स्थित छोटी माई दरबार में स्थापित बूढ़ी खेर माई की बुजुर्ग स्वरूप प्रतिमा भी आकर्षण का केंद्र रही। बताया गया कि एक श्रद्धालु को स्वप्न में माता ने यह प्रतिमा स्थापित करने का संकेत दिया था, जिसके बाद कलाकार नीरज नामदेव द्वारा इसे विशेष रूप से तैयार किया गया। नवरात्रि के पूरे नौ दिन यह प्रतिमा श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बनी रही।
वहीं, भक्त जगदीश विश्वकर्मा की कठिन तपस्या ने भी सभी का ध्यान खींचा। उन्होंने अपने शरीर पर जवारे बोकर नौ दिनों तक केवल मां नर्मदा का जल ग्रहण किया और साधना की। विसर्जन के साथ ही पूरे आयोजन का समापन हुआ, लेकिन यह आयोजन एक बार फिर यह संदेश दे गया—जब आस्था सच्ची हो, तो हर कठिन तपस्या भी आसान लगने लगती है।