Sagar- चिड़ियों की हरकत और बादलों का रंग बता देता था मौसम का हाल, चींटियां के घर छोड़ते ही झमाझम
जून के महीने में मानसून की दस्तक सुनाई देने लगती है। आज हमारे मोबाइल फोन पर मौसम का हर अपडेट पहुंच जाता है। तेज आंधी, बारिश, बिजली गिरने या तूफान की चेतावनी कुछ ही सेकंड में मिल जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब न मोबाइल थे, न इंटरनेट और न ही मौसम विभाग की इतनी सटीक जानकारी, तब लोग बारिश का अनुमान कैसे लगाते थे?
दरअसल, हमारे बुजुर्ग प्रकृति के संकेतों को पढ़कर मौसम का हाल जान लेते थे। सागर जिले की रहली के 84 वर्षीय जीवन लाल उपाध्याय बताते हैं कि पहले खेती-किसानी और दैनिक जीवन पूरी तरह प्रकृति पर आधारित था। लोग छोटी-छोटी चींटियों से लेकर आसमान में तैरते बादलों तक को देखकर मौसम का पूर्वानुमान लगा लेते थे।
उनके अनुसार, जब बारिश आने वाली होती है तो चींटियां अपने बिलों से बाहर निकलने लगती हैं। यदि वे अंडे लेकर ऊंची जगहों की ओर चढ़ती दिखाई दें, तो इसे जल्द बारिश होने का संकेत माना जाता है। यह मान्यता आज भी ग्रामीण इलाकों में काफी हद तक सही साबित होती है।
वहीं, छोटी चिड़ियां भी बारिश का संदेश लेकर आती हैं। मानसून से पहले अक्सर वे धूल में पंख फड़फड़ाते हुए नहाती नजर आती हैं। ग्रामीण इसे आने वाली बारिश का संकेत मानते हैं।
आसमान में बादलों का आकार भी बहुत कुछ कहता है। यदि बादल तीतर के पंखों की तरह ऊपर-नीचे बिखरे हुए दिखाई दें, तो माना जाता है कि वे खाली नहीं जाएंगे और बारिश जरूर करवाएंगे।
इतना ही नहीं, टिटहरी पक्षी के अंडों को देखकर भी वर्षा का अनुमान लगाया जाता है। ग्रामीण मान्यता है कि जितने अंडे दिखाई दें, उतने महीनों तक अच्छी बारिश होती है।
तकनीक के इस दौर में भले ही मौसम की जानकारी एक क्लिक पर मिल जाती हो, लेकिन प्रकृति के ये अनोखे संकेत आज भी ग्रामीण ज्ञान और अनुभव की जीवंत मिसाल बने हुए हैं