Sagar- दो महीने और जीते होते तो खुद लेते पद्मश्री, बेटे ने राष्ट्रपति से लिया पिता का सम्मान
सागर के लिए गर्व और भावुक कर देने वाला एक पल राष्ट्रपति भवन में देखने को मिला। बुंदेली मार्शल आर्ट को देश-दुनिया में पहचान दिलाने वाले दाऊ भगवानदास रैकवार को मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान दिया गया। लेकिन नियति का खेल देखिए, जिन्होंने जीवनभर इस कला की सेवा की, वे यह सम्मान अपने हाथों से नहीं ले सके। उनकी जगह उनके बेटे ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों यह सम्मान ग्रहण किया।
दाऊ भगवानदास रैकवार ने अपना पूरा जीवन बुंदेली मार्शल आर्ट और अखाड़ा शैली को समर्पित कर दिया। बचपन से अखाड़े से जुड़े दाऊ ने पारंपरिक युद्धकला को नया स्वरूप दिया और उसे देशभर में पहचान दिलाई। लाठी, भाला, ढाल, तलवार और त्रिशूल जैसी पारंपरिक कलाओं के जरिए उन्होंने बुंदेलखंड की संस्कृति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
केंद्र सरकार ने उनकी इसी अमूल्य सेवा को देखते हुए उन्हें वर्ष 2026 के पद्मश्री सम्मान के लिए चुना था। 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर जब इस सम्मान की घोषणा हुई थी, तब दाऊ भगवानदास बेहद खुश थे और उन्होंने इसे अपने जीवन की तपस्या का फल बताया था। लेकिन नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था। लंबी बीमारी के चलते 19 अप्रैल 2026 को भोपाल एम्स में उनका निधन हो गया। और फिर 23 जून को राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में उनके बेटे राजकुमार रैकवार ने भारी मन से यह सम्मान ग्रहण किया।
राजकुमार ने कहा कि यह पल उनके लिए गर्व का था, लेकिन दिल में एक टीस भी थी। काश उनके पिता दो महीने और साथ होते तो वे खुद राष्ट्रपति के हाथों यह सम्मान प्राप्त करते। यह सम्मान सिर्फ दाऊ भगवानदास को नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की उस मिट्टी को मिला है जिसने एक अनसुने नायक को देश का गौरव बना दिया।