Sagar-700 साल पुराने कल्पवृक्ष में मंडराया संकट, जाने क्या है इसका वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व
सागर कलेक्ट्रेट परिसर में सैकड़ो साल पुराने दो दुर्लभ कल्पवृक्ष लगे हुए हैं. इन्हीं में से एक एंट्री गेट के पास स्थित 700 साल पुराने कल्पवृक्ष के अस्तित्व पर संकट आ गया है बीते दिनों हुई बारिश और आंधी तूफान की वजह से इस कल्पवृक्ष ने एक तरफ झुकाव ले लिया है. ऐसे में सागर शहर के स्थानीय लोग और हिंदू संगठन इसको बचाने के लिए आगे आए हैं उन्होंने इस कल्पवृक्ष को संरक्षित करने प्रशासन से मांग की है.
ऐसी मान्यता है कि इस पेड़ का पूजन करने और इसके नीचे खड़े होकर प्रार्थना करने पर मन वांछित फल की प्राप्ति होती है तो दूसरी ओर वैज्ञानिकों के अनुसार यह पेड़ दुनिया के केवल तीन द्वीपों पर पाया जाता है जिसमें अफ्रीका ऑस्ट्रेलिया और भारत शामिल है इसका अंदाजा आप ऐसे लगा सकते हैं कि इतना प्राचीन कल्पवृक्ष के सागर जिले में मात्र तीन पेड़ है,
कल्पवृक्ष की उत्पत्ति को लेकर सागर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर अजय शंकर मिश्रा बताते हैं कि "पृथ्वी की उत्पत्ति के समय बहुत बड़ा हिस्सा गोंडवाना लैंड के नाम से जाना जाता था. कल्पवृक्ष गोंडवाना लैंड में पाया जाता था. द्वीपों के विस्थापन के समय गोंडवाना लैंड अफ्रीका,ऑस्ट्रेलिया और भारतीय उपमहाद्वीप में बंट गया. इस तरह ये वृक्ष तीनों जगह पहुंच गया. इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम एंडेनसोनिया डिजिटेटा है. वैज्ञानिक एंडरसन ने इसकी खोज की थी और इसकी पत्तियां पांच हिस्सों में होती हैं, इसलिए इसे डिजिटेटा कहते हैं. कल्प वृक्ष की आयु साढ़े चार हजार से लेकर 5 हजार साल तक होती है. इसकी अलग-अलग प्रजातियां 13 देशों में पाई जाती हैं और यह हर देश में पूजनीय हैं.
सागर के ज्योतिष आचार्य एवं कुंडली विशेषज्ञ पंडित शोभित शास्त्री महाराज बताते हैं कि पुराणों में कल्पवृक्ष को बेहद ही पूजनीय माना गया है. गीता में इसका उल्लेख है. समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से कल्पवृक्ष भी एक था. इसे देवराज इंद्र को दिया गया था और इंद्र ने इसकी स्थापना सुरकानन वन में की थी. बताया जाता है कि इस वृक्ष का नाश कल्पांत तक नहीं होता. शास्त्रों में विवरण है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति सच्चे मन से जो भी इच्छा करता है, वह पूरी हो जाती है.