Sagar - जगन्नाथ रथ यात्रा पर मालपुआ का महाभोग, जाने सागर में कैसे हुई थी शुरूआत
भगवान को श्रद्धा और प्रेम से अर्पित किया जाने वाला हर प्रसाद विशेष होता है, लेकिन रथ द्वितीया के अवसर पर भगवान जगन्नाथ और श्रीकृष्ण को चढ़ाए जाने वाले मालपुआ का महत्व सबसे अलग माना जाता है। यही वजह है कि सागर में इस दिन मालपुआ केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक बन जाता है। भगवान का महाभोग पाने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं और दुकानों पर खरीदारी की होड़ मच जाती है।
सागर शहर का बड़ा बाजार क्षेत्र मिनी वृंदावन के नाम से प्रसिद्ध है। लगभग एक किलोमीटर के दायरे में 100 से अधिक मंदिर स्थित हैं, जिनमें अधिकांश भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित हैं। रथ द्वितीया पर यहां से एक दर्जन से अधिक रथ यात्राएं निकलती हैं। कई मंदिरों में भगवान को गर्भगृह से बाहर लाकर श्रद्धालुओं को दर्शन कराए जाते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र भक्ति और उत्साह से सराबोर हो उठता है।
इस पर्व की सबसे खास बात यह है कि मालपुआ सालभर नहीं मिलता। पूरे वर्ष में केवल एक दिन, वह भी महज पांच से छह घंटे के लिए इसकी बिक्री होती है। इस परंपरा को निभाने के लिए करीब 500 मीटर के दायरे में 50 से अधिक अस्थायी दुकानें सजती हैं। इनमें कई दुकानें ऐसी हैं, जहां पीढ़ी-दर-पीढ़ी पारंपरिक विधि से मालपुआ तैयार किया जा रहा है।
बड़े बाजार स्थित रिछारिया प्रतिष्ठान के संचालक सुरेंद्र रिछारिया बताते हैं कि उनका परिवार पिछले पांच पीढ़ियों से इस परंपरा को निभा रहा है। उनके अनुसार, सबसे पहले उनके पूर्वज गणेश प्रसाद रिछारिया ने भगवान के भोग के लिए यहां मालपुआ बनाना शुरू किया था। आज भी उसी शुद्धता, पवित्रता और पारंपरिक विधि से मालपुआ तैयार किया जाता है। उन्होंने बताया कि उनके प्रतिष्ठान से ही बिहारी जी सरकार के लिए विशेष भोग का प्रसाद भेजा जाता है, जिसे वे अपने परिवार का सौभाग्य और सेवा मानते हैं।