Sagar - बुरी बला को दूर करने निकलेगी तिसाला रथ यात्रा, 186 साल पुरानी परंपरा
आज से करीब 186 साल पहले सागर पर घोर संकट आया था. पूरा शहर बड़ी माता (चिकनपाॅक्स) और लाल बुखार की चपेट में था. तब चिकित्सा सुविधाएं ना होने के कारण लोग धर्म कर्म के जरिए महामारियों से लड़ते थे. ऐसे में सागर में रहने वाली केशरवानी समाज को अपने मूल स्थान पर की जाने वाली तिसाला पूजा की याद आयी और वो पूजा सागर में की गयी, तब जाकर लोगों को महामारी से छुटकारा मिला. दरअसल, सागर आने से पहले केशरवानी समाज यूपी के मिर्जापुर में निवास करती थी. जहां विंध्यवासिनी देवी के मंदिर में महामारियों, प्रेतबाधा और तंत्रमंत्र से मुक्ति के लिए हर तीसरे साल ये पूजा की जाती थी.
करीब 10 दिन चलने वाले इस अनुष्ठान की शुरूआत वैसे तो माता पूजन के साथ होती है, लेकिन इसमें कई तांत्रिक क्रियाएं भी की जाती है. सागर में 10 दिनों तक चलने वाला ये अनुष्ठान 20 जुलाई से शुरू हो गया और 31 जुलाई को माता की रथयात्रा निकाली जाएगी, जिसके साथ अनुष्ठान संपन्न होगा.
पहले दिन शीतला माता मंदिर में केशरवानी समाज और अन्य समाज की महिलाएं इकट्ठा होती हैं. जो घर से एक कलश जल लाती है, जिसमें सात तरह की अभिमंत्रित सामग्री होती है और फिर सात जगह शहर की नाकाबंदी की जाती है
अगले चरण में महिलाओं द्वारा सांकेतिक बाजार लूटने और रिश्तेदारों के यहां जाकर भीखी मांगने की क्रिया होती, महिलाओं को परंपरा अनुसार गेहूं और पैसे भीखी में दिए जाते हैं, जिससे महिलाओं द्वारा घर में माता के लिए प्रसाद और गुजिया तैयार की जाती
31 जुलाई को यह रथ यात्रा निकलेगी जिसमें बकरों के द्वारा माता का रथ खींचा जाएगा और नींबू का उतारा होगा जो भी लोग इसमें शामिल होते हैं वह बुरी नजर बुरी बला और बुरे साए से दूर रहते हैं