Sagar- गांव की बेटी ने शतरंज में रचा इतिहास, अब नेशनल आर्बिटर बनकर बढ़ा रहीं बेटियों का हौसला
शतरंज... महज 64 खानों और 32 मोहरों का खेल नहीं, बल्कि धैर्य, रणनीति, दूरदृष्टि और सही समय पर सही फैसला लेने की कला है। इसी खेल में सागर जिले के बीना के समीप छोटे से गांव आगासौद की रहने वाली अंजलि चौरसिया ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर ऐसी पहचान बनाई है, जो आज ग्रामीण क्षेत्र की बेटियों के लिए मिसाल बन चुकी है।
सीमित संसाधनों और ग्रामीण परिवेश से निकलकर अंजलि ने शतरंज में राष्ट्रीय स्तर तक का सफर तय किया। खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाने के बाद अब वे राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सीनियर नेशनल आर्बिटर यानी निर्णायक की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं। उनकी यह उपलब्धि बताती है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या महंगे संसाधनों की मोहताज नहीं होती।
अंजलि बताती हैं कि बचपन में उन्होंने घर में अपनी मां और भाई को शतरंज खेलते देखा। यहीं से उनके मन में इस खेल को सीखने की इच्छा पैदा हुई। शुरुआत में शतरंज महज एक रुचि थी, लेकिन धीरे-धीरे यही रुचि जुनून में बदल गई। सफर आसान नहीं था। ग्रामीण परिवेश में प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के लिए जरूरी संसाधनों की कमी उनके सामने बड़ी चुनौती थी। लेकिन अंजलि ने परिस्थितियों को अपनी राह की बाधा नहीं बनने दिया।
उनके सपनों को नई उड़ान देने में बीपीसीएल द्वारा संचालित प्रोजेक्ट लक्ष्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस परियोजना के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और बेहतर अवसर मिले। इससे उनके खेल में निखार आया और राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ने का रास्ता भी खुला। आज अंजलि न सिर्फ शतरंज की बिसात पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में निर्णायक की भूमिका निभाकर खेल से जुड़ी अपनी जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभा रही हैं।
अंजलि की कहानी उन तमाम बेटियों के लिए प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को छोटा मान लेती हैं। उनकी सफलता यही संदेश देती है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत लगातार हो और परिवार व समाज का सहयोग मिले, तो छोटे गांव से निकलकर भी बड़े मुकाम हासिल किए जा सकते हैं।